आज सुबह हुई दो लोगो की याद के साथ
जो आज नहीं मेरे साथ मेरे पास
कोई था जिसके कदम मदमस्त नाचते थे
कोई था जिसके खूब पक्के इरादे थे
जिसकी बोली में हमेशा एक चहक सी रहती थी
जिसके बातो में जेसे ठंडी हवा बहती थी
कोई था जो एकदम सीधा साधा था
कोई था जिसने किया आसमान छूने का वादा था
जिसकी आँखों में शांत सा समंदर था
जिसकी सोच में उसके दिल का दर्पण था
एक से मेरी होती लगभग हर दिन बात थी
दूसरे से बस होती सिर्फ मुलाकात थी
एक ने मुझे अपनी यादो में शामिल किया था
दूसरे ने सबके मन पे कब्ज़ा किया था
अचानक से आई आज उनकी याद
जो नहीं हैं आज किसी के भी साथ
एक ने खुद को मौत को बुला लिया
तो दूसरे को खुद मौत ने गले लगा लिया
कुछ अनकहे सवाल
कुछ उलझे से जवाब
ले गए वो लोग अपने जीवन के साथ
-लक्की
२१ अक्टूबर २०१०
Tell your brain to swim in rever of real and imaginary thoughts to Quench your Creative Thirst !!
Thursday, October 21, 2010
Tuesday, September 28, 2010
यादें
कुछ लोग यूँ ही मिल जाते हैं अचानक से
कुछ साथ रह जाते हैं ज़िन्दगी भर के लिए
तो कुछ बस यूँ ही चलते हैं साथ पल दो पल के लिए
यादो में हम बस यूँ ही खो जाते हैं
जब वो लोग हमसे जुदा हो जाते हैं
कुछ के तो चेहरे भी धुंधला जाते हैं
पर कुछ हमारी आँखों में बस जाते हैं
कुछ दोस्त बनके हमारे आस पास नज़र आते हैं
तो कुछ यूँ ही परछाइयो में खो जाते हैं
कुछ की यादें हमें हर वक़्त हँसाती हैं
वही कुछ की यादें हमें आँसू दे जाती हैं
कुछ मिलते हैं हमारे रंग में खो जाते हैं
कुछ अपने जीवन के कुछ रंग हमें दे जाते हैं
कुछ जाने के बाद फिर मिल जाते हैं
कुछ जाते हैं, आते हैं, फिर चलें जाते हैं
यादें ही हैं जो साथ निभाती हैं
कभी हँसाती हैं तो कभी गुदगुदाती हैं
--लक्की
११ सितम्बर २००९
Saturday, September 25, 2010
कलम न हो जाना तू इतिहास !
कभी थी बिखेरती पन्नों पे कोई कहानी
कवि के कदमों पर कभी चली बेजुबानी
किसी के दुःख को बयाँ करती कभी
पथ प्रदर्शक बनती किसी की कभी
शब्दों की माला रच छू जाती किसी के मन को
कभी कोई समीकरण बन छू जाती प्रसिद्धि के शिखर को
डायरी के पन्नों पर कभी बिखेरती दिल की बातें
प्रेमी के हाथों पड़कर कभी बुनती सुनहरी बातें
मैं देखती हूँ हर जगह यूँ ही
एक भाव विहीन चेहरा नजर आता है
कलम तेरा जीवन
एक इतिहास नजर आता है
- लक्की शर्मा
१७ मई २०१०
कवि के कदमों पर कभी चली बेजुबानी
किसी के दुःख को बयाँ करती कभी
पथ प्रदर्शक बनती किसी की कभी
शब्दों की माला रच छू जाती किसी के मन को
कभी कोई समीकरण बन छू जाती प्रसिद्धि के शिखर को
डायरी के पन्नों पर कभी बिखेरती दिल की बातें
प्रेमी के हाथों पड़कर कभी बुनती सुनहरी बातें
मैं देखती हूँ हर जगह यूँ ही
एक भाव विहीन चेहरा नजर आता है
कलम तेरा जीवन
एक इतिहास नजर आता है
- लक्की शर्मा
१७ मई २०१०
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