Friday, January 21, 2011

मैं

छोटी छोटी खुशियों प़े मुस्कुराती मै

इस चारदीवारी में यादो के किला बनाती मै

लाल तो कभी पीला रंग दीवारों प़े लगाती मै

कतरा कतरा जोड़ के चित्र बनाती मै

ख़ामोशी से अपनी सब कुछ कह जाती मैं

पंख लगा के सपनो के बादल छु आती मैं

नखरों से अपने तुमको सताती मैं

रोज सुबह मंदिर में दिया जलाती मैं

आँगन की इस चौखट पर रंगोली बनाती मैं

कुछ पुरानी यादो पे आंसू बहाती मैं

क्यों अपने गीत में खुद ही रह जाती मैं

                              -लक्की , २१ जनवरी २०११

Tuesday, December 28, 2010

काला भी तो एक रंग है

ज़िनदगी के कैसे हैं देखो तो ये रंग
कभी हैं ये अँधेरा कभी हम हुए रौशनी के संग
मुझे तब ये लगा था जेसे अब नहीं बचा कुछ
अब लग रहा की जेसे दमन में आ गया सब
वो वक़्त था कुछ ऐसा की आंसू भी कम पड़े थे
अब तो मेरी राहो में बस फूल ही झाडे थे
ज़िन्दगी फिसल रही थी रेत की तरह तब
मेरे पास हैं एक प्याला अब रेत थामने को
मेरी आँखों की नमी तब हो चली थी खारी
इन आंसुओ को पी जाते हो शरबत समझ के अब तुम
कल तुम अगर होते तो ये ना जान पाती
काला भी तो एक रंग हैं इस रंगीन ज़िन्दगी का

Wednesday, November 3, 2010

क्यों

छूने को हैं खुला आसमान

पर मन में ये घुटन सी क्यों हैं

मेरे पास ही तो तुम हो

फिर भी मिलने की लगन क्यों हैं

बातें तो होती ही इतनी

खामोश फिर भी ये मन क्यों हैं

जवाब सारे हैं मेरे पास

फिर भी ये उलझन क्यों हैं

आज सब कुछ जगमगा रहा

मेरे दियो में रौशनी कम क्यों हैं

में खुश तो बहुत हूँ

मेरी ख़ुशी में ये गम क्यों हैं