Tuesday, January 25, 2011

कि मेरे पैरों कि ये ज़मीन मेरी नहीं

गलियों की ये ख़ामोशी मुझे अहसास दिलाती हैं

कि मेरे पैरों कि ये ज़मीन मेरी नहीं

वही गलिया जहाँ रोज चूड़ी वाला आवाज़ लगता हैं

वही घर जहाँ पडोसी से आज भी दही उधार लिया जाता हैं

वही नुक्कड़ जहाँ में रोज चाट खाने जाता था

वही कोना जहाँ पान खा के हम बातें बनाया करते थे

वहीं बातें मुझे सता के ये याद दिलाती हैं

कि मेरे पैरों कि ये ज़मीन मेरी नहीं

रिक्शे वाले से १ रुपए के लिए बहस जहाँ आज भी होती हैं

गली के मंदिर में जहाँ आरती रोज सुबह शाम होती हैं

दिवाली पे जहाँ हर दिल में रौनक होती हैं

होली के रंग जहाँ हर गाल पे सज जाते हैं

बेरंग चेहरे मुझे बोलते नज़र आते हैं

कि मेरे पैरों कि ये ज़मीन मेरी नहीं

                        लक्की,२६ जनवरी २०११

Friday, January 21, 2011

मैं

छोटी छोटी खुशियों प़े मुस्कुराती मै

इस चारदीवारी में यादो के किला बनाती मै

लाल तो कभी पीला रंग दीवारों प़े लगाती मै

कतरा कतरा जोड़ के चित्र बनाती मै

ख़ामोशी से अपनी सब कुछ कह जाती मैं

पंख लगा के सपनो के बादल छु आती मैं

नखरों से अपने तुमको सताती मैं

रोज सुबह मंदिर में दिया जलाती मैं

आँगन की इस चौखट पर रंगोली बनाती मैं

कुछ पुरानी यादो पे आंसू बहाती मैं

क्यों अपने गीत में खुद ही रह जाती मैं

                              -लक्की , २१ जनवरी २०११

Tuesday, December 28, 2010

काला भी तो एक रंग है

ज़िनदगी के कैसे हैं देखो तो ये रंग
कभी हैं ये अँधेरा कभी हम हुए रौशनी के संग
मुझे तब ये लगा था जेसे अब नहीं बचा कुछ
अब लग रहा की जेसे दमन में आ गया सब
वो वक़्त था कुछ ऐसा की आंसू भी कम पड़े थे
अब तो मेरी राहो में बस फूल ही झाडे थे
ज़िन्दगी फिसल रही थी रेत की तरह तब
मेरे पास हैं एक प्याला अब रेत थामने को
मेरी आँखों की नमी तब हो चली थी खारी
इन आंसुओ को पी जाते हो शरबत समझ के अब तुम
कल तुम अगर होते तो ये ना जान पाती
काला भी तो एक रंग हैं इस रंगीन ज़िन्दगी का